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Vom Gesetz zum Nichtstun verdonnert

Bayernweit wird 27 000 Flüchtlingen die Arbeitserlaubnis verweigert. Sie würden arbeiten, anstatt von Sozialhilfe zu leben.
Von Walter Schiessl

Belete Adane würde liebend gerne seine kleine Familie ernähren, wenn man ihn ließe. Foto: Schiessl
Belete Adane würde liebend gerne seine kleine Familie ernähren, wenn man ihn ließe. Foto: Schiessl

Wörth.Sie heißen Belete Adane, Abraham Inzara und Barain Kulhal (Namen geändert) und sie haben eines gemeinsam: Sie bekommen von der Regierung der Oberpfalz keine Arbeitserlaubnis. Alle drei hätten Lehrstellen, die sie sofort antreten könnten, wenn man sie nur ließe. Die Regierung argumentiert, ihre Anträge seien im Asylverfahren abgelehnt worden, sie hätten eine schlechte Bleibeperspektive und man wolle keine falschen Anreize schaffen. Aber die Behörde und in diesem Fall der Steuerzahler muss deshalb für jeden Flüchtling die Miete und knappe 376 Euro an Sozialhilfe im Monat berappen. Belete, Abraham und Barain, die seit gut vier Jahren im Landkreis leben, würden viel lieber auf die staatliche Unterstützung verzichten und einfach arbeiten, um selbst Geld zu verdienen, Steuern zahlen zu können und eben nicht dem Land zur Last zu fallen. 27 000 Fälle, in denen die Arbeitserlaubnis verweigert wurden, sind in Bayern registriert, für die Stadt und den Landkreis gibt es nach Auskunft der Regierung keine Zahlen.

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